
भाजपा आलाकमान के पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष पद पर नितिन नबीन की नियुक्ति के बाद अब उन प्रदेशों के अध्यक्ष बनाने की शुरूआत होने वाली है, जहां संगठन के चुनाव नहीं हुए हैं। बताया जा रहा कि 15 जनवरी को खरमास समाप्त होने के बाद इस संबंध में दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव की भी प्रक्रिया शुरू होगी।
इस बार मौजूदा अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा को दोबारा मौका मिलने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है। पार्टी के अंदरूनी बातों और हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों को देखते हुए यह संकेत मिल रहे हैं कि संगठन की कमान किसी नए और चौंकाने वाले चेहरे को सौंपी जा सकती है।
पार्टी सूत्रों का कहना है कि यदि वीरेंद्र सचदेवा को दोबारा अवसर देना होता तो कुछ प्रदेशों की तरह उनकी नियुक्ति पहले ही कर दी जाती, लेकिन दिल्ली में ऐसा न होना इस बात की ओर इशारा है कि केंद्रीय नेतृत्व संगठनात्मक बदलाव के मूड में है। सचदेवा को दूसरा कार्यकाल न देने के पीछे दिल्ली सरकार और दिल्ली के कुछ सांसदों से उनके संबंध अपेक्षित रूप से सहज न होना एक बड़ा कारण बताया जा रहा है।
संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल की कमी को लेकर भी शीर्ष नेतृत्व में असंतोष की चर्चा है। इसके अलावा हाल ही में एमसीडी के 12 वार्डों में हुए उपचुनाव भी वीरेंद्र सचदेवा के खिलाफ जा रहे हैं। इन उपचुनावों में भाजपा को पहले की तुलना में कम सीटें मिलना पार्टी के भीतर नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रहा है।
गुटबाजी को लेकर प्रदेश नेतृत्व पर भी सवाल
एमसीडी में भाजपा पार्षदों के बीच जारी गुटबाजी को लेकर भी प्रदेश नेतृत्व पर उंगलियां उठ रही हैं। कई वरिष्ठ नेताओं का आरोप है कि आपसी खींचतान को नियंत्रित नहीं किया जा रहा है और इसका सीधा असर एमसीडी की राजनीति और पार्टी की छवि पर पड़ रहा है। यही वजह है कि प्रदेश अध्यक्ष पद पर बदलाव को अब अपरिहार्य माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन की तरह ही दिल्ली में भी कोई अपेक्षाकृत नया या कम चर्चित, लेकिन संगठनात्मक रूप से मजबूत चेहरा सामने आ सकता है।
हालांकि संभावित नामों की सूची लंबी है। उत्तर पश्चिम दिल्ली से सांसद योगेंद्र चांदोलिया, पश्चिमी दिल्ली की सांसद कमलजीत सहरावत, नई दिल्ली की सांसद बांसुरी स्वराज के अलावा एनडीएमसी के उपाध्यक्ष कुलजीत सिंह चहल सहित करीब एक दर्जन नेताओं के नामों पर चर्चा चल रही है।
संतुलन बना सकने वाले को दी जाएगी कमान
पार्टी के जानकारों का कहना है कि केंद्रीय नेतृत्व ऐसे नेता की तलाश में है जो संगठन, सरकार और जनप्रतिनिधियों के बीच बेहतर संतुलन बना सके, साथ ही आगामी एमसीडी चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा की जमीनी पकड़ को मजबूत कर सके। कुल मिलाकर, खरमास के बाद होने वाला प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव दिल्ली भाजपा की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है और आने वाले समय में पार्टी की दिशा और रणनीति तय करेगा।



