
लगभग एक दशक की देरी के बाद, भारत का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज NSE आखिरकार अपनी लंबे समय से इंतजार की जाने वाली पब्लिक लिस्टिंग (NSE IPO) की ओर कदम बढ़ा रहा है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का IPO, जिसका प्रस्ताव पहली बार 2016 में आया था, अब फिर से चर्चा में है, क्योंकि ऐसा लगता है कि इसके रास्ते में आ रही एक अहम रेगुलेटरी रुकावट दूर हो गई है, जो कि मार्केट रेगुलेटर सेबी (SEBI) से जुड़ी है।
सेबी के एक्सपर्ट पैनल ने कर दिया रास्ता साफ
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के एक्सपर्ट पैनल ने NSE के उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत वह लगभग 1,800 करोड़ रुपये का भुगतान करके लंबे समय से लटके मामलों का निपटारा करेगा।
इस कदम को उन मुद्दों को सुलझाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिनके कारण एनएसई का IPO वर्षों से अटका हुआ था। इससे पहले, NSE ने एक ऐसे ही मामले को निपटाने के लिए 643 करोड़ रुपये का भुगतान भी किया था, जिससे उसने अपनी पुरानी समस्याओं को सुलझाने और आगे बढ़ने का इरादा जाहिर किया।
को-लोकेशन और डार्क फाइबर से जुड़े हैं मामले
एनएसई को यह मंजूरी सेटलमेंट ऑर्डर्स पर बनी चार सदस्यों वाली एक विशेषज्ञ समिति की ओर से मिली है, जिसकी अध्यक्षता कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जय नारायण पटेल कर रहे हैं। इस पैनल ने NSE के को-लोकेशन और डार्क फाइबर मामलों से जुड़े आवेदनों को मंजूरी दे दी है। ये मामले रेगुलेटरी चिंताओं के लिहाज से सबसे बड़े मामलों में से रहे हैं।
अब होगा ये कि सिफारिशों को अंतिम मंजूरी के लिए SEBI के होल-टाइम मेंबर्स के सामने रखा जाएगा। अगर इन्हें मंजूरी मिल जाती है, तो इससे NSE के लिए अपनी IPO योजनाओं को फिर से शुरू करने का रास्ता खुल सकता है।
इन वजहों से हुई है NSE के IPO में देरी
NSE का IPO बार-बार टलने वाली पब्लिक ऑफरिंग में से एक रहा है। 2016 में अपने ड्राफ्ट पेपर जमा करने के बाद से, एक्सचेंज को कई रुकावटों का सामना करना पड़ा है, जिनमें शामिल हैं :
कोलोकेशन मामले में आरोप
गवर्नेंस में कमियाँ
तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर चिंताएँ



