ताइवान के करीब फिर दिखी चीन की घेराबंदी

ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने सोमवार को जानकारी दी है कि द्वीप के चारों ओर चीन की सैन्य गतिविधियों में अचानक तेजी आई है। मंत्रालय के अनुसार, पिछले 24 घंटों में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के कई विमानों और युद्धपोतों की आवाजाही दर्ज की गई है, जिससे इस क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव एक बार फिर गहरा गया है।

ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि सोमवार को स्थानीय समयानुसार सुबह 6 बजे तक ताइवान के आसपास चीन के 7 सैन्य विमान, 5 नौसैनिक जहाज और 1 आधिकारिक सरकारी जहाज सॉर्टी करते देखे गए।

मंत्रालय ने नोट किया कि कुल 7 विमानों में से 5 ने दोनों क्षेत्रों के बीच की अनौपचारिक सीमा मिडियन लाइन को पार किया और ताइवान के उत्तरी और दक्षिण-पश्चिमी वायु रक्षा पहचान क्षेत्र में प्रवेश किया। ताइवान की सेना ने कहा कि वे स्थिति की निरंतर निगरानी कर रहे हैं और सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत उचित जवाब दिया गया है।

ताइवान पर जारी सैन्य दबाव

चीन की यह आक्रामक गतिविधि केवल सोमवार तक सीमित नहीं थी, बल्कि पूरे सप्ताहांत में भारी सैन्य उपस्थिति दर्ज की गई। रविवार को ताइवान के क्षेत्रीय जल क्षेत्र के आसपास 12 चीनी सैन्य विमान, पांच नौसैनिक जहाज और एक सरकारी जहाज देखे गए थे। इनमें से 9 विमानों ने मिडियन लाइन को पार कर ताइवान के हवाई क्षेत्र में घुसपैठ की थी।

इसी तरह, शनिवार को भी ताइवान ने 8 चीनी सैन्य विमानों, 6 नौसैनिक जहाजों और 2 आधिकारिक जहाजों की उपस्थिति का पता लगाया था। शनिवार को घुसपैठ की गंभीरता अधिक थी क्योंकि सभी 8 विमानों ने सीमा पार कर ताइवान के मध्य, दक्षिण-पश्चिमी और पूर्वी वायु रक्षा क्षेत्रों में प्रवेश किया था।

विवाद क्यों है इतना जटिल?

ताइवान पर चीन का दावा एक अत्यंत जटिल मुद्दा है, जिसकी जड़ें ऐतिहासिक, राजनीतिक और कानूनी तर्कों में समाहित हैं। बीजिंग का आधिकारिक रुख यह है कि ताइवान चीन का एक अविभाज्य हिस्सा है। यह दृष्टिकोण चीन की राष्ट्रीय नीति का आधार है और इसे वहां के घरेलू कानूनों और अंतरराष्ट्रीय बयानों के माध्यम से पुरजोर तरीके से उठाया जाता है।

दूसरी ओर, ताइवान एक स्वतंत्र पहचान बनाए रखता है। उसकी अपनी चुनी हुई सरकार, स्वतंत्र सेना और सुदृढ़ अर्थव्यवस्था है, जो एक स्वतंत्र राष्ट्र की तरह कार्य करती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ताइवान की स्थिति संप्रभुता, आत्मनिर्णय और गैर-हस्तक्षेप के सिद्धांतों की परीक्षा ले रही है।

क्या है ताइवान और चीन का झगड़ा?

ताइवान पर चीन के दावे का इतिहास 1683 से शुरू होता है जब किंग राजवंश ने इस द्वीप को अपने साम्राज्य में मिलाया था। हालांकि, 1895 में पहले चीन-जापान युद्ध के बाद चीन को यह द्वीप जापान को सौंपना पड़ा, जिसके बाद ताइवान 50 वर्षों तक जापानी उपनिवेश रहा।

द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की हार के बाद ताइवान वापस चीनी नियंत्रण में आ गया, लेकिन संप्रभुता का औपचारिक हस्तांतरण कभी कानूनी रूप से स्पष्ट नहीं हो पाया।

इस विवाद ने आधुनिक रूप 1949 में लिया, जब चीनी गृहयुद्ध के परिणामस्वरूप मुख्य भूमि पर पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना हुई। गृहयुद्ध में हार के बाद राष्ट्रवादी रिपब्लिक ऑफ चाइना की सरकार भागकर ताइवान आ गई और वहां से पूरे चीन पर अपना दावा पेश किया।

तब से यह क्षेत्र दोहरी संप्रभुता के दावों के बीच फंसा हुआ है। वर्तमान में ताइवान एक ‘डी फैक्टो’ स्वतंत्र राज्य के रूप में काम कर रहा है, लेकिन उसने चीन के साथ सीधे सैन्य संघर्ष से बचने के लिए अब तक औपचारिक स्वतंत्रता की घोषणा नहीं की है।

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