
केवल फ्रेंचाइज को भुनाने के लिए जब फिल्म बनती है, तो उसका हाल कुछ ऐसा ही होता है, जैसे डबल धमाल (2011) और टोटल धमाल (2019) के बाद अब धमाल 4 (Dhamaal 4) का हुआ है। धमाल फ्रेंचाइज की यह चौथी फिल्म बेहद निराश करती है। फिल्म के अंत में धमाल 5 (Dhamaal 5) बनने का संकेत भी है, जिसे फिलहाल इसके निर्माताओं को छोड़ देना चाहिए, अगर उनके पास ढंग की कहानी न हो।
घिसी पिटी है फिल्म की कहानी?
इस बार भी फिल्म में खजाने की खोज है। सौ साल पहले समुद्री लुटेरे शैतान सिंह ने अंग्रेजों से खजाना लूटकर उसे एक टापू पर छुपा दिया था। उसने एक नक्शा भी बनाया था, जो वर्तमान में पृथ्वी (उपेंद्र लिमये) के हाथ लगा है। समुद्री लुटेरा अधूरा (रवि किशन) उससे वह नक्शा छीनने में कामयाब तो हो जाता है, लेकिन गलती से वह नक्शा उससे जल जाता है। पहाड़ से गिरने से पहले पृथ्वी खजाने का पता गुड्डू (अजय देवगन), लल्लन (रितेश देशमुख), आदी (अरशद वारसी), मानव (जावेद जाफरी) के साथ कुछ और लोगों को बता देता है, जिसके बाद सब उसकी खोज में निकल जाते हैं।
धमाल ने जो कमाल साल 2007 में दिखाया था, वह कमाल दोबारा अब तक नहीं हुआ है। इस फिल्म की कहानी, स्क्रीनप्ले और संवाद पारितोष पेंटर, बलविंदर सिंह सूरी, बंटी राठौड़, वेद प्रकाश ने लिखी है, जो घिसी-पिटी और पुराने दौर की लगती हैं, जबकि पारितोष, बलविंदर और बंटी धमाल फिल्म के मिजाज से वाकिफ हैं, वह पहली धमाल के लेखक रह चुके हैं।
बेहतर होते हैं वाट्सएप पर भेजे गए जोक्स
वाट्सअप पर भेजे जाने वाले जोक्स भी कई बार इससे बेहतर होते हैं। इंद्र कुमार जैसे अनुभवी निर्देशक भी इस कहानी को नहीं भांप पाए। अजय फिल्म के निर्माता और उनकी ही वीएफएक्स (विजुअल इफेक्ट्स) कंपनी ने इसके वीएफएक्स बनाए हैं, जो निम्न स्तर के हैं। जो थोड़े बहुत हंसाने वाले सीन फिल्म में थे, वह सारे ट्रेलर में पहले ही दिखाए जा चुके हैं।
इसके अलावा रीक्रिएट किए गए गाने गुलाबी साड़ी… और चटनी… के अलावा कोई गाना थिएटर से निकलने पर याद नहीं रहता है। हालांकि अमर मोहिले का बैकग्राउंड स्कोर और सुधीर कुमार चौधरी की सिनेमैटोग्राफी फिल्म को झेलने लायक बनाने का प्रयास करती है।
कलाकारों ने कितना किया फिल्म के साथ न्याय
अभिनय की बात करें, तो अजय देवगन (Ajay Devgn), रितेश देशमुख (Ritiesh Deshmukh), अरशद वारसी (Arshad Warsi), जावेद जाफरी (Javed Jaaferi), रवि किशन (Ravi Kishan), संजय मिश्रा और उपेंद्र लिमये जैसे अनुभवी कलाकार स्क्रिप्ट में दायरे में रहकर अपने काम के साथ न्याय करते हैं। आदी और मानव की जोड़ी इस फिल्म में स्क्रीन पर हंसी के पल लाते हैं। ईशा गुप्ता फिल्म में क्यों हैं,उन्हें भी सोचना चाहिए। अंजलि आनंद को अपने रोल को सोच समझकर चुनना चाहिए, क्योंकि वह खुद बाडी शेमिंग का शिकार रही हैं। ऐसे में फिल्म में बढ़े वजन का मजाक उड़ाने वाले सीन से कामेडी करने का प्रयास निराशाजनक है।



